त्यौहार आते ही नकली मिठाई का बाजार गर्म, मिलावट खोरो की बल्ले-बल्ले


Advertisement

http://indiafactnews.co.in पोर्टल में पब्लिश न्यूज़ की जिम्मेदारी स्वयं संवादाता की होगी। इसके लिए एडिटर जिम्मेदार नहीं होगा नहीं न्यूज़ पब्लिश करने के लिए एडिटर की अनुमति आवश्यक है।


धर्मेन्द्र सिंह राघव

अलीगढ़। त्यौहार के दिनों में बाज़ार में नक़ली मावे और पनीर से बनी मिठाइयों का कारोबार ज़ोर पकड़ लेता है। आए-दिन छापामारी की ख़बरें सुनने को मिलती हैं कि फ़लां जगह इतना नक़ली या मिलावटी मावा पकड़ा गया, फ़लां जगह इतना। इन मामलों में केस भी दर्ज होते हैं, गिरफ़्तारियां भी होती हैं और दोषियों को सज़ा भी होती है। इस सबके बावजूद मिलावटख़ोर कोई सबक़ हासिल नहीं करते और मिलावटख़ोरी का धंधा बदस्तूर जारी रहता है। त्योहारी सीज़न में कई मिठाई विक्रेता, होटल और रेस्टोरेंट संचालक मिलावटी और नक़ली मावे से बनी मिठाइयां बेचकर मोटा मुनाफ़ा कमाएंगे।

ज़्यादातर मिठाइयां मावे और पनीर से बनाई जाती हैं। दूध दिनोदिन महंगा होता जा रहा है। ऐसे में असली दूध से बना मावा और पनीर बहुत महंगा बैठता है। फिर इनसे मिठाइयां बनाने पर ख़र्च और ज़्यादा बढ़ जाता है, यानी मिठाई की क़ीमत बहुत ज़्यादा हो जाती है। इतनी महंगाई में लोग ज़्यादा महंगी मिठाइयां ख़रीदना नहीं चाहते। ऐसे में दुकानदारों की बिक्री पर असर पड़ता है। इसलिए बहुत से हलवाई मिठाइयां बनाने के लिए नक़ली या मिलावटी मावे और पनीर का इस्तेमाल करते हैं। नक़ली और मिलावटी में फ़र्क़ ये है कि नक़ली मावा शकरकंद, सिंघाड़े, मैदे, आटे, वनस्पति घी, आलू, अरारोट को मिलाकर बनाया जाता है। इसी तरह पनीर बनाने के लिए सिंथेटिक दूध का इस्तेमाल किया जाता है। मिलावटी मावे उसे कहा जाता है, जिसमें असली मावे में नक़ली मावे की मिलावट की जाती है। मिलावट इस तरह की जाती है कि असली और नक़ली का फ़र्क़ नज़र नहीं आता। इसी तरह सिंथेटिक दूध यूरिया, कास्टिक सोडा, डिटर्जेन्ट आदि का इस्तेमाल किया जाता है। सामान्य दूध जैसी वसा उत्पन्न करने के लिए सिंथेटिक दूध में तेल मिलाया जाता है, जो घटिया क़िस्म का होता है। झाग के लिए यूरिया और कास्टिक सोडा और गाढ़ेपन के लिए डिटर्जेंट मिलाया जाता है।

इतना ही नहीं, रंग-बिरंगी मिठाइयों में इस्तेमाल होने वाले सस्ते घटिया रंगों से भी सेहत पर बुरा असर पड़ता है। अमूमन मिठाइयों में कृत्रिम रंग मिलाए जाते हैं। जलेबी में कृत्रिम पीला रंग मिलाया जाता है, जो नुक़सानदेह है। मिठाइयों को आकर्षक दिखाने वाले चांदी के वरक़ की जगह एल्यूमीनियम फॉइल से बने वर्क़ इस्तेमाल लिए जाते हैं। इसी तरह केसर की जगह भुट्टे के रंगे रेशों से मिठाइयों को सजाया जाता है।

हालांकि खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने के लिए कई क़ानून बनाए गए, लेकिन मिलावटख़ोरी में कमी नहीं आई। खाद्य पदार्थों में मिलावटखोरी को रोकने और उनकी गुणवत्ता को स्तरीय बनाए रखने के लिए खाद्य संरक्षा और मानक क़ानून-2006 लागू किया गया है। दिपावली पर मिठाई की मांग ज़्यादा होती है और इसके मुक़ाबले आपूर्ति कम होती है। मिलावटख़ोर मांग और आपूर्ति के इस फ़र्क़ का फ़ायदा उठाते हुए बाज़ार में मिलावटी सामग्री से बनी मिठाइयां बेचने लगते हैं। इससे उन्हें तो ख़ासी आमदनी होती है, लेकिन ख़ामियाज़ा उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ता है। हालांकि स्वास्थ्य विभाग द्वारा छापेमारी कर और नमूने लेकर ख़ानापूर्ति कर ली जाती है। फिर कुछ दिन बाद मामला रफ़ा-दफ़ा हो जाता है। दरअसल मिलावटख़ोरी पर रोक लगाने के लिए इतनी सख़्ती नहीं बरती जाती जितनी बरती जानी चाहिए। इसलिए यही बेहतर है कि मिठाई, चॉकलेट और सूखे मेवे ख़रीदते वक़्त एहतियात बरतनी चाहिए। साथ ही इनके ख़राब होने पर इसकी शिकायत ज़रूर करनी चाहिए, ताकि मिलावटख़ोरों पर दबाव बने। जागरूक बने, सुखी रहें।