होटल व ढावों में दो जून रोटी की जुगाड़ में पिस रहा बचपन


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-बाल श्रमिकों के पुनर्वास की नही दुरुस्त व्यवस्था

…..सरकार व स्वयंसेवी संगठन भले ही लाख दावे करें पर इन सभी दावों के बावजूद आज भी सुबह से लेकर शाम तक सैंकड़ों बच्चे शहर व नगर के अंदर आपको कूड़े-कचरे व गंदगी के ढेर में अपनी जिंदगी तलाशते हुए आसानी से देखे जा सकते हैं। इनमें से कई मानसिक व शारीरिक प्रताडऩा झेलते हुए दुकानों पर भी काम करने को विवश हैं। उधर बाल मजदूरी को लेकर चल रही शासन की सारी योजनाएं ठंडे बस्ते में पड़ी हैं। खेलने-कूदने और पढ़ाई-लिखाई के दिनों में सैंकड़ों बच्चे कचरे के ढेर में अपनी आजीविका तलाशते रहते हैं। इन बच्चों की सुबह कचरे के बीच लोहे के टुकड़े व अन्य सामान बीनते हुए शुरू होती है और शाम ढलने तक पेट की खातिर गंदगी का बोझा अपने कंधों पर ढोते हुए इन्हें देखा जा सकता है। बड़े-बड़े शहरों की बात तो अलग है। जीवाणा जैसे छोटे से कस्बे में भी ऐसे मासूम हाथ में थेले लेकर कचरे के ढेर में अपना जीवन तलाशते देखे जाते है। ये बच्चे कचरे के ढेर में प्लास्टिक की बोतले व लोहा आदि बीनकर अपना गुजारा करते है।
कचरे के ढेर मे बचपन कुछ इस तरह गुम हुआ कि शिक्षा की कौन कहे दो वक्त की रोटी के लिए कूड़ो की ढेर ही उनकी नियति बन चुकी है। लड़के घर से निकले तो देर रात वजनदार बोरी का भार उठाए लोटना कुछ मासूमों की दिनचर्या मे शामिल हो गया है। घर मे रोटी की चिंता ने तो मानो उनका बचपना ही छीन लिया हो। बस्ते की जगह कूड़े की भार ने तो उनकी जिंदगी के मायने ही बदल दिए है। शहर की गंदगी भरी गलियों को ले या कोई नाली का किनारा हो। हर जगह कुछ ऐसे मासूम दिखाई पड़ जाएगे जो अपना बचपन कूड़े चुनते बीता रहे है।
एक बार जब ऐसे नोनिहाल कूडे की ढ़ेर से कुछ बीनते हुए अपने बोरे में रख रहे थे। तभी मैंने प्रश्न किया तो वे बोले कि स्कूल नहीं जाते बल्कि कूड़े से निकाले गए सामानों को कबाड़ी के हाथों बेचकर पैसा प्राप्त करते हैं तथा परिवार के लिए दो वक्त की रोटी की व्यवस्था करते है। उनसे पूछा गया की आखिर वो पढ़ाई क्यों नहीं करते ? उनका जवाब था कि जब पढ़ेगे तो घर का चूल्हा कैसे चलेगा। इन मासूमों के मुख से निकलता जवाब प्रशासन और सरकार को सीधे-सीधे कटघरे में खड़ा कर देता है। शासन-प्रशासन ने तो ऐसे ढ़ेर सारे उपाय किए लेकिन उन प्रयासों का भी कोई मतलब या परिणाम नहीं निकलता नजर आ रहा है। दो जून की रोटी की तलाश में पल-पल छिनता बचपन धीरे-धीरे अंधकारमय भविष्य की राह पर बढ़ता जा रहा है। हाथ में कॉपी कलम की जगह कचरे के ढेर में तलाशते भविष्य या फिर लोगो के झूठे बर्तन मांजकर अपने साथ परिजनों के भी पेट भरने की जद्दोजहद। शहर के व्यस्तम इलाकों के होटलों में ऐसे कई बाल श्रमिक है जिन्हे सुनहरे भविष्य की दरकार है। कई बाल श्रमिक यहां कॉपी व किताब की जगह प्लेट व थाली धोकर अपना पेट पाल रहे है। इनके पास अपना भविष्य कूड़े के ढेर की जगह कहीं और नही दिखता है। हाल है कि शहर से लेकर ग्रामीण इलाके तक के बाजारों के होटल, चाय की दुकान व अन्य संस्थाओ मे काम करते बच्चे नजर आते है। खासकर बाल श्रमिको से काम लेना अपराध है। बाल श्रमिाकों से काम लेने वालों के खिलाफ बाल श्रम निषेध एवं विनियमन अधिनियम 1986 एवं अन्य कानूनों के तहत कठोर कार्यवाई करने के लिए प्रतिबद्ध है। बावजूद शहर एवं गांव के कई दुकानदार बच्चों से काम लेते है। फिर भी विभाग व प्रशासन कुछ नहीं कर पाता है। वास्तविक स्थिति यह है कि पुनर्वास की व्यवस्था ठीक ढंग से नहीं होने से बच्चे होटलों एवं ढ़ावों में पहुॅच रहे है। ऐसा गांवों की बजाय शहरों में ज्यादा देखने को मिलता है। सरकार ने वैसे सभी थानों, प्रशासनिक अधिकारियों को ऐसे बच्चों को स्कूलों में नामांकन कराने की जिम्मेवारी सौंपी गयी है। पर यहां इस तरह किसी थाने द्वारा अंजाम देते हुए नही देखा जाता। किसी ने भी उस तरफ झाकते की कोशिश नहीं कि जहां ऐसे बच्चे अपने छोटी सी उम्र में नाजुक कंधो पर भारी भरकम बोझ उठाते हो। बाल श्रम उन्मूलन कार्यक्रमों का भी यहां कोई असर नहीं होता।
कुछ दिन पहले ही मैंने जब जीवाणा ग्राम में इन मासूम बच्चों को, जिनके पीठ पर बस्ता होना चाहिए था, उनकी पीठ पर प्लास्टिक आदि की बोतलों से भरे थेले को देखा तो मुझसे रहा नही गया और मैंने अपनी भावनाओं व जज्बात को अपनी कलम में पिरोया।
शायद ! सरकार इन मासूम बचपन को नई जिंदगी देने की सार्थक कोशिश करें।

गेबाराम चौहान जालोर।
लेखक एक पत्रकार है।

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